Sunday, December 29, 2019

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उत्तर प्रदेश राज्य के लिए कोली, गडरिया, धनगर, पाल, बघेल, समुदायों को एससी श्रेणी में नहीं रखा गया है।

बढ़ई लोहार को शिल्पकार में शामिल करने का कष्ट करें - सुभाष कुमार मंडलायुक्त गढ़वाल

उत्तराखंड के मुख्यसचिव और गढ़वाल के मंडल आयुक्त रहे सुभाष कुमार ने एक पत्र  प्रमुख सचिव उत्तराखंड शासन को दिनांक 07 नवंबर 2007 को लिखा है जिसमे उन्होंने कहा है कि लोहार बढ़ई शिल्पकार अनुसूचित जाति में लाये जाए. ये पत्र बहुत सारे सवाल पैदा करता है इस पत्र कि एक झलक प्रस्तुत है




प्रश्न:
१ लोहार सुनार दरजी केवट जातिया पिछड़ी जाति कि सूची में हैं क्या इनको शासन अनुसूचित जाति में सम्मिलित कर सकता है? नहीं कभी नहीं क्योंकि किसी भी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार संसद का है
२ क्या नौकरशाहों कि भ्रमित करने वाली रिपोर्ट से आरक्षण कि नीतिया तय होती हैं?
३ जिस नौकर शाह की नागरिकता ही फर्जी हो और जो खुद ही जनजाति का फर्जी आरक्षण लेकर बैठा हो उसकी रिपोर्ट कैसी होगी?
४ क्या नुसूचित जाति या पिछड़ा वर्ग की किसी सूची में पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान किया है? नहीं , तो फिर कैसे लोहार सुनार और बढ़ाई को मैदान और पहाड़ में अलग अलग विभाजित किया जाता है?
५ कोली जाति न तो पिछड़ी जाति में है न अनुसूचित जाति में उसको किस प्रकार अनुसूचित जाति में शामिल करने कि बात कही जा रही है?
६ सुभाष कुमार लिखते हैं कि पर्वतीय क्षेत्र कि बढ़ाई टमटा कोली लुहार सुनार आदि जातियों को उनके कार्यों के आधार पर शिल्पकार माना जाता है? यहाँ सुभाष कुमार जी को मालूम नहीं है कि आरक्षण कार्यों के आधार पर नहीं मिलता है , आरक्षण का आधार जाति है, ऐसे में सुभाष कुमार जी आखिर बिना सर पैर की बात कैसे कर रहे हैं?
७ सुबाश कुमार फर्जी नागरिकता और फर्जी प्रमाण पत्र से नौकर शाह बने ऐसे व्यक्ति कि बातो का क्या औचित्य है लिंक देखिये
www.thebureaucratnews.com/?p=2206
http://www.p7news.com/dpage.php?id=33924&category=TopStory

1950 के प्रेसिडेन्शियल आदेश में यह शिल्पकार की उपजातियों में शामिल थी और आदेश के साथ जारी टिप्पणियों में इन्हें शिल्पकार की उपजातियां कहा गया था। 1956 में संशोधन के बाद शिल्पकार को तो अनुसूचित जाति में शामिल किया गया, लेकिन 26 उपजातियों को उसका हिस्सा नहीं बनाया गया।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कुम्हार को एससी में शामिल करने का मुद्दा


नई दिल्ली, [माला दीक्षित]। उत्तर प्रदेश में कुम्हार जाति को अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेशिया प्रजापति महासभा की याचिका पर सुनवाई के बाद नोटिस जारी किया है। इसमें कुम्हार सहित 26 जातियों को शिल्पकार की उपजाति बताया गया है। शिल्पकार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गत 29 मई को दिए गए फैसले में कसेरा व कुम्हार आदि जातियों को उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति मानने से इन्कार कर दिया था। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई व जस्टिस एनवी रमना की पीठ ने याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एसआर सिंह की दलीलें सुनने के बाद प्रदेश सरकार व अन्य से जवाब मांगा है। इससे पहले एसआर सिंह ने हाई कोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि कुम्हार सहित 26 जातियां शिल्पकार की उपजातियां हैं। 1950 के भारत सरकार के आदेश में भी इसका जिक्र भी है। इनकी सूची 1950 के आदेश के साथ लगी थी। 1956 में जब अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति कानून में संशोधन हुआ था तो उसमें भी शिल्पकार जाति शामिल की गई थी। शिल्पकार की इन 26 उपजातियों को विशेष तौर पर बाहर करने की घोषणा नहीं है। इसलिए इन्हें नये कानून का भी हिस्सा माना जाएगा।


पुराना है विवाद

कुम्हार को अनुसूचित जाति में शामिल करने का विवाद पुराना है। 1950 के प्रेसिडेन्शियल आदेश में यह शिल्पकार की उपजातियों में शामिल थी और आदेश के साथ जारी टिप्पणियों में इन्हें शिल्पकार की उपजातियां कहा गया था। 1956 में संशोधन के बाद शिल्पकार को तो अनुसूचित जाति में शामिल किया गया, लेकिन 26 उपजातियों को उसका हिस्सा नहीं बनाया गया। वर्ष 1957 में उत्तर प्रदेश सरकार ने संशोधित कानून के मुताबिक आदेश जारी कर दिया।


वर्ष 2004 में विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा। घनश्याम दास मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि कसेरा जाति अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं है। इसके बाद ट्रिब्युनल का एक आदेश कुछ अलग आया और 2011 में प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया। इस फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि शिल्पकार की 26 उपजातियां हैं और कसेरा उनमें से एक है।

हाई कोर्ट के 2011 के फैसले को आधार बनाते हुए पिछले साल स्वरूप चंद सिंह ने हाईकोर्ट में नई रिट याचिका दायर की जिसमें स्वयं को कसेरा जाति का बताते हुए मिर्जापुर के जिलाधिकारी को उसके बेटे तरंग सिंह के लिए अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी जारी करने का निर्देश देने की मांग की। इसपर हाई कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने गत मई में 2011 का आदेश रद कर 2004 के फैसले पर मुहर लगा दी।

उत्तर प्रदेश सरकार में तत्कालीन सचिव कालिका प्रसाद ने १४ जून १९९६ को कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के आयुक्तों और जिलाधिकारियों को आदेश किया था कि उत्तराखंड क्षेत्र के पिछड़े वर्गों कि सूची में लोहार, सोनार, बढ़ई, आदि जातियों को पिछड़ी जाती का प्रमाण पत्र दिया जाए

उत्तर प्रदेश सरकार में तत्कालीन सचिव कालिका प्रसाद ने १४ जून १९९६ को कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के आयुक्तों और जिलाधिकारियों को आदेश किया था कि उत्तराखंड क्षेत्र के पिछड़े वर्गों कि सूची में लोहार, सोनार, बढ़ई, आदि जातियों को पिछड़ी जाती का प्रमाण पत्र दिया जाए लेकिन आज भी इन जातियों को अनुसूचित जाती शिल्पकार का प्रमाण पत्र दिया जा रहा है और संविधान का मजाक बनाया जा रहा है

News सांसद टमटा का तर्क

उत्तराखंड के जाति प्रमाण पत्रों का सच , बढ़ाई , लुहार और टमटा(ताम्रकार या ठठेरा) जातियों को अनुसूचित जाति में शिल्पकार जाति के फर्जी प्रमाण पत्र दिए जा रहे हैं जबकि ये जातिया पिछड़ी जाति में आती है .. सांसद टमटा का तर्क भी देखिये , सबको अपनी कुर्सी जाने का डर सता रहा है

आरक्षण का आधार काम है या जाति

उत्तराखंड के मुख्य सचिव सुभाष कुमार जी, जो फर्जी जाति प्रमाण पत्र से नौकरी पाए हैं, जब गढ़वाल के मंडलायुक्त थे तब इन्होने एक पत्र प्रमुख सचिव समाज कल्याण उत्तराखंड को लिखा था और उसमे लिखा था कि बढ़ई, ताम्रकार (टमटा), लुहार, सुनार, आदि जातिया चूंकि शिल्प का काम करती हैं इसलिए उन्हें शिल्पकार माना जाए, सवाल ये उठता है कि क्या किसी को मात्र काम के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है कल सुभाष कुमार जी कहेंगे कि ब्राह्मण धोभी का काम करता है या मोची का काम करता है तो उसको आरक्षण दिया जाए. सवाल ये उठता है आरक्षण का आधार काम है या जाति?

RTI 2011 उत्तराखंड के सन्दर्भ में लोहार, सुनार, बढ़ई, और ताम्रकार (टमटा)जातियां अनुसूचित जाती में नहीं आती हैं 

भारत सरकार क्या कहती है उत्तराखंड के शिल्पकारो के बारे मे देखिये इस पत्र में, पात्र कह्त्र है की उत्तराखंड के सन्दर्भ में लोहार, सुनार, बढ़ई, और ताम्रकार (टमटा)जातियां अनुसूचित जाती में नहीं आती हैं , इससे स्पष्ट होता है कि इन जातियों को फर्जी तरीके से शिल्पकार का आरक्षण दिया जा रहा है जो गलत है