Sunday, December 29, 2019

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उत्तर प्रदेश राज्य के लिए कोली, गडरिया, धनगर, पाल, बघेल, समुदायों को एससी श्रेणी में नहीं रखा गया है।

बढ़ई लोहार को शिल्पकार में शामिल करने का कष्ट करें - सुभाष कुमार मंडलायुक्त गढ़वाल

उत्तराखंड के मुख्यसचिव और गढ़वाल के मंडल आयुक्त रहे सुभाष कुमार ने एक पत्र  प्रमुख सचिव उत्तराखंड शासन को दिनांक 07 नवंबर 2007 को लिखा है जिसमे उन्होंने कहा है कि लोहार बढ़ई शिल्पकार अनुसूचित जाति में लाये जाए. ये पत्र बहुत सारे सवाल पैदा करता है इस पत्र कि एक झलक प्रस्तुत है




प्रश्न:
१ लोहार सुनार दरजी केवट जातिया पिछड़ी जाति कि सूची में हैं क्या इनको शासन अनुसूचित जाति में सम्मिलित कर सकता है? नहीं कभी नहीं क्योंकि किसी भी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का अधिकार संसद का है
२ क्या नौकरशाहों कि भ्रमित करने वाली रिपोर्ट से आरक्षण कि नीतिया तय होती हैं?
३ जिस नौकर शाह की नागरिकता ही फर्जी हो और जो खुद ही जनजाति का फर्जी आरक्षण लेकर बैठा हो उसकी रिपोर्ट कैसी होगी?
४ क्या नुसूचित जाति या पिछड़ा वर्ग की किसी सूची में पर्वतीय क्षेत्र के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान किया है? नहीं , तो फिर कैसे लोहार सुनार और बढ़ाई को मैदान और पहाड़ में अलग अलग विभाजित किया जाता है?
५ कोली जाति न तो पिछड़ी जाति में है न अनुसूचित जाति में उसको किस प्रकार अनुसूचित जाति में शामिल करने कि बात कही जा रही है?
६ सुभाष कुमार लिखते हैं कि पर्वतीय क्षेत्र कि बढ़ाई टमटा कोली लुहार सुनार आदि जातियों को उनके कार्यों के आधार पर शिल्पकार माना जाता है? यहाँ सुभाष कुमार जी को मालूम नहीं है कि आरक्षण कार्यों के आधार पर नहीं मिलता है , आरक्षण का आधार जाति है, ऐसे में सुभाष कुमार जी आखिर बिना सर पैर की बात कैसे कर रहे हैं?
७ सुबाश कुमार फर्जी नागरिकता और फर्जी प्रमाण पत्र से नौकर शाह बने ऐसे व्यक्ति कि बातो का क्या औचित्य है लिंक देखिये
www.thebureaucratnews.com/?p=2206
http://www.p7news.com/dpage.php?id=33924&category=TopStory

1950 के प्रेसिडेन्शियल आदेश में यह शिल्पकार की उपजातियों में शामिल थी और आदेश के साथ जारी टिप्पणियों में इन्हें शिल्पकार की उपजातियां कहा गया था। 1956 में संशोधन के बाद शिल्पकार को तो अनुसूचित जाति में शामिल किया गया, लेकिन 26 उपजातियों को उसका हिस्सा नहीं बनाया गया।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कुम्हार को एससी में शामिल करने का मुद्दा


नई दिल्ली, [माला दीक्षित]। उत्तर प्रदेश में कुम्हार जाति को अनुसूचित जाति (एससी) में शामिल करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेशिया प्रजापति महासभा की याचिका पर सुनवाई के बाद नोटिस जारी किया है। इसमें कुम्हार सहित 26 जातियों को शिल्पकार की उपजाति बताया गया है। शिल्पकार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गत 29 मई को दिए गए फैसले में कसेरा व कुम्हार आदि जातियों को उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति मानने से इन्कार कर दिया था। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई व जस्टिस एनवी रमना की पीठ ने याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एसआर सिंह की दलीलें सुनने के बाद प्रदेश सरकार व अन्य से जवाब मांगा है। इससे पहले एसआर सिंह ने हाई कोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि कुम्हार सहित 26 जातियां शिल्पकार की उपजातियां हैं। 1950 के भारत सरकार के आदेश में भी इसका जिक्र भी है। इनकी सूची 1950 के आदेश के साथ लगी थी। 1956 में जब अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति कानून में संशोधन हुआ था तो उसमें भी शिल्पकार जाति शामिल की गई थी। शिल्पकार की इन 26 उपजातियों को विशेष तौर पर बाहर करने की घोषणा नहीं है। इसलिए इन्हें नये कानून का भी हिस्सा माना जाएगा।


पुराना है विवाद

कुम्हार को अनुसूचित जाति में शामिल करने का विवाद पुराना है। 1950 के प्रेसिडेन्शियल आदेश में यह शिल्पकार की उपजातियों में शामिल थी और आदेश के साथ जारी टिप्पणियों में इन्हें शिल्पकार की उपजातियां कहा गया था। 1956 में संशोधन के बाद शिल्पकार को तो अनुसूचित जाति में शामिल किया गया, लेकिन 26 उपजातियों को उसका हिस्सा नहीं बनाया गया। वर्ष 1957 में उत्तर प्रदेश सरकार ने संशोधित कानून के मुताबिक आदेश जारी कर दिया।


वर्ष 2004 में विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा। घनश्याम दास मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि कसेरा जाति अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं है। इसके बाद ट्रिब्युनल का एक आदेश कुछ अलग आया और 2011 में प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया। इस फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि शिल्पकार की 26 उपजातियां हैं और कसेरा उनमें से एक है।

हाई कोर्ट के 2011 के फैसले को आधार बनाते हुए पिछले साल स्वरूप चंद सिंह ने हाईकोर्ट में नई रिट याचिका दायर की जिसमें स्वयं को कसेरा जाति का बताते हुए मिर्जापुर के जिलाधिकारी को उसके बेटे तरंग सिंह के लिए अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी जारी करने का निर्देश देने की मांग की। इसपर हाई कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने गत मई में 2011 का आदेश रद कर 2004 के फैसले पर मुहर लगा दी।

उत्तर प्रदेश सरकार में तत्कालीन सचिव कालिका प्रसाद ने १४ जून १९९६ को कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के आयुक्तों और जिलाधिकारियों को आदेश किया था कि उत्तराखंड क्षेत्र के पिछड़े वर्गों कि सूची में लोहार, सोनार, बढ़ई, आदि जातियों को पिछड़ी जाती का प्रमाण पत्र दिया जाए

उत्तर प्रदेश सरकार में तत्कालीन सचिव कालिका प्रसाद ने १४ जून १९९६ को कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के आयुक्तों और जिलाधिकारियों को आदेश किया था कि उत्तराखंड क्षेत्र के पिछड़े वर्गों कि सूची में लोहार, सोनार, बढ़ई, आदि जातियों को पिछड़ी जाती का प्रमाण पत्र दिया जाए लेकिन आज भी इन जातियों को अनुसूचित जाती शिल्पकार का प्रमाण पत्र दिया जा रहा है और संविधान का मजाक बनाया जा रहा है

News सांसद टमटा का तर्क

उत्तराखंड के जाति प्रमाण पत्रों का सच , बढ़ाई , लुहार और टमटा(ताम्रकार या ठठेरा) जातियों को अनुसूचित जाति में शिल्पकार जाति के फर्जी प्रमाण पत्र दिए जा रहे हैं जबकि ये जातिया पिछड़ी जाति में आती है .. सांसद टमटा का तर्क भी देखिये , सबको अपनी कुर्सी जाने का डर सता रहा है

आरक्षण का आधार काम है या जाति

उत्तराखंड के मुख्य सचिव सुभाष कुमार जी, जो फर्जी जाति प्रमाण पत्र से नौकरी पाए हैं, जब गढ़वाल के मंडलायुक्त थे तब इन्होने एक पत्र प्रमुख सचिव समाज कल्याण उत्तराखंड को लिखा था और उसमे लिखा था कि बढ़ई, ताम्रकार (टमटा), लुहार, सुनार, आदि जातिया चूंकि शिल्प का काम करती हैं इसलिए उन्हें शिल्पकार माना जाए, सवाल ये उठता है कि क्या किसी को मात्र काम के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है कल सुभाष कुमार जी कहेंगे कि ब्राह्मण धोभी का काम करता है या मोची का काम करता है तो उसको आरक्षण दिया जाए. सवाल ये उठता है आरक्षण का आधार काम है या जाति?

RTI 2011 उत्तराखंड के सन्दर्भ में लोहार, सुनार, बढ़ई, और ताम्रकार (टमटा)जातियां अनुसूचित जाती में नहीं आती हैं 

भारत सरकार क्या कहती है उत्तराखंड के शिल्पकारो के बारे मे देखिये इस पत्र में, पात्र कह्त्र है की उत्तराखंड के सन्दर्भ में लोहार, सुनार, बढ़ई, और ताम्रकार (टमटा)जातियां अनुसूचित जाती में नहीं आती हैं , इससे स्पष्ट होता है कि इन जातियों को फर्जी तरीके से शिल्पकार का आरक्षण दिया जा रहा है जो गलत है

कोली नहीं है शिल्पकार की उपजाति



उत्तराखंड में अनुसूचित जाति के फर्जी आरक्षण

उत्तराखंड में अनुसूचित जाति के फर्जी आरक्षण

बाप अनुसूचित बेटा पिछड़ी जाति

बाप अनुसूचित बेटा पिछड़ी जाति

पिछड़ा वर्ग आयोग ने माना लोहार बढ़ई शिल्पकार में नहीं आते

पिछड़ा वर्ग आयोग ने माना लोहार बढ़ई शिल्पकार में नहीं आते

जाति प्रमाण पत्र की वैद्यता कितनी होती है

पिछड़ी जाति के लोगो को परेशान करने के उद्देश्य से कई बार विभाग और लोक सेवा आयोग उत्तराखंड द्वारा समय समय पर नवीनतम जाति प्रमाण पत्र कि मांग की जाती है जो कि गलत है जब इन विभागों से पूछा जाता है कि नवीनतम प्रमाण पत्र मांगने के पीछे क्या कारण है तो वे इसका कोई लिखित उत्तर नहीं देते. वास्तविकता ये है कि जाति प्रमाण पत्र कि वैद्यता निर्धारित करने वाला कोई शासनादेश नहीं है सब मनमाने तरीके से माँगा जाता है. ओबीसी प्रमाण पत्र के मामले में एक दूसरा तथ्य है क्रीमी लेयर का, जिसको पिछड़े वर्ग का लाभ नहीं मिलता. क्रीमी लेयर के बारे में जानने के लिए देखें
 http://www.ncbc.nic.in/Creamylayer.html
 बस क्रीमी लेयर के कारण से ही नवीनतम प्रमाण पत्र माँगा जाता है , दूसरा तथ्य यह है कि कई लोगो को पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र तब भी नहीं दिया जाता है जबकि उनका पूर्व का प्रमाण पत्र बना होता है जबकि इस मेमोरेंडम नीचे में लिखा है व्यक्ति कि जाति कभी नहीं बदलती यानी उसकी जाति का भाग सदैव शाश्वत रहता है जबकि सिर्फ क्रीमी लेयर का भाग बदलता है

10-08-1950 को अनुसूचित जाति का नोटिफिकेशन हुआ है

उत्तराखंड की तहसीलों में पिछड़ी जाति के प्रमाण पत्र बनाने वाले आवेदकों से कहा जा रहा है कि 1950 से रहने का सबूत लगाओ या 1950 के भूमि अभिलेख संलग्न कीजिये ये तथ्य पूरी तरह गलत और भ्रामक है. पूछने पर बताया जाता है कि आरक्षण 1950 से लागू हुआ इसलिए 10-08-1950 का रिकार्ड लाइए. वास्तव में ये तथ्य गलत है वास्तविकता ये है कि आरक्षण के निम्न नोटिफिकेशन हुए हैं 
10-08-1950 को अनुसूचित जाति का नोटिफिकेशन हुआ है 
06-09-1950 को अनुसूचित जन जाति का नोटिफिकेशन हुआ है
10-09-1993 को पिछड़ी जाति का नोटिफिकेशन हुआ है 
इसलिए  अनुसूचित जाति या जनजाति से नोटिफिकेशन के दिनांक के अभिलेख मांगे जाये तो समझ में आता है लेकिन पिछड़ी जाति से 1993 के अभिलेख न मांगकर 1950 के अभिलेख क्यों मांगे जा रहे हैं? ये पिछडो के खिलाफ साज़िश है

समाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय लोहार बढ़ई विश्वकर्मा ओड टमटा मिस्त्री को अनसूचित जाति नहीं मानता

http://uttarakhandawaaz.blogspot.in/2012/06/blog-post_28.html 
समाजिक न्याय  एवं अधिकारिता मंत्रालय लोहार बढ़ई विश्वकर्मा ओड टमटा मिस्त्री को अनसूचित जाति नहीं मानता है अपने पत्रदिनांक १९ अगस्त २०११ से खुलासा हुआ है

पिछड़ा वर्ग आयोग ने कहा कि पहाड़ के शिल्पकार पिछड़े वर्ग में हैं


1996 में पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मा० राम सूरत सिंह ने सचिव कार्मिक को एक पत्र लिखकर निर्देश दिए थे कि उत्तराखंड में लोहार सोनार बढ़ई गद्दी केवट दरजी आदि जातियों को पिछड़ी जाति के प्रमाण पत्र निर्गत करने के निर्देश दिए थे. कोटद्वार निवासी बृजमोहन के शिकायती पत्र पर ये आदेश पिछड़ा वर्ग आयोग ने दिया था. जिसमे बृजमोहन जी ने आयोग को अवगत कराया था कि उत्तराखंड में इन जातियों को शिल्पकार जाती का प्रमाण पत्र देकर फर्जी तरीके से अनुसूचित जाति के रूप में दिखाया गया है 

लोकायुक्त उत्तराखंड ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों पर उठाया सवाल



लोकायुक्त उत्तराखंड ने फर्जी जाति प्रमाण पत्रों पर उठाया सवाल

कोटद्वार उत्तराखंड का असली नाम कोलीद्वार है

कोटद्वार उत्तराखंड का असली नाम कोलीद्वार है


Dictionary Of The Economic Products Of India Vol-iii"


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 0027_2004A.pdf


CULTIVATION.


Flowering, &c. — This species is sometimes said to flower gregariously,

but more frequently single clumps are found to do so. M r. Gam ble

publishes an account of its flowering along the base of the hills in the

North-West Provinces. Mr Greig (the Conservator) reported : I have

observed numbers with one or two stems of a clump in flower; in some

places as many as 5 per cent, of the clumps have flowering stems, and in

others I have only found ten clumps with flowering stems out of several

thousands examined. Between Kolidwara and Haldu Khata whole clumps

over large areas have seeded and died, and the ground is now a dense

thicket of young clumps of from 10 to 30 feet high. The seeding com-

menced here in 1869 or 1870, and has been going on ever since.” Whole

areas, he continues, in Palim, Kansore, &c., seeded and died in 1877-

78. {Man. Timbers, 430.) Mr. Brown writes of the flowering of this,

species in the North-Western Provinces : “ As an example of great vi-

tality in certain bamboos, I may mention here that on the same road along

which Bambusa arundinacea was growing, a clump of Dendrocalamus

strictus flowered in 1881 and sent forth new but thin shoots in 1882. These

flowered again in 1885, ^-nd now new scraggy and thin shoots are pushing

up in the midst of the old clump.”

DICHROSTACHYS, nc,; Gen. Pl., 1., 592. Dichrostachys cinerea, W. & A. J Wif!ll/, Ie., t. 357,. Fl • .Er. [Ind., II" 288 l LEGUMINOSJE. SYIl.-MIMOSA CINIlRE,\, Limz.; Rnxb. l DESMAN'fIlUS CIlIEREUS. Wit/d., ACACIA CINEREA, Sprel1J(. ; A. DAL6A, Des'IJ. Vern.-.Vurtuli, HIND.; KUlllai, kunrat, klteri, MHAIRWARA'; 81111/ai, kalltai. MERWAIU; f(heri, AJMIlRll; Klten, RAJ.; S,,/(um. kati, MAR. & GOND.; Vadalalla. 'lJetdata,a ('lJedittaiulljJ kolindu, in Ainslie), TAM'; Verm'u ('lJellituru kalla/Ill, yell" ('lJC1Iuturu, 'lJelut~'ru, .tJla jam"", vamttllTtI accordiog- to Elliot) TIlL,; Andara, SING.; Virat,rjksha (according to Ainslie), SANS. References.-Rotb., N.lltd., Ed. C.B.C., 422; Bralulis, Fr,r. Fl., r7r,. Heddame. Fl. Sylv., t. rixx:cu ; Gamble. Malt. Timb., 141/ i T1z1vaites, En. Ceylon PI, 99; Dul". co' Gibs., Bomb. FI .. 84; AltrJdS011, Cat, Ph. (",ii Sind Pl., S.~; Sir W. Elti(Jt. Fl. Andlt., 40, 1,,1. 190 91, W. & A. Prod. (864),1" 278,' Ain.li,·, Mat.lud., iT., 0/51!; DrIllY, U. Pl., r8r; D·402 Milky Saps. FOOD Flowe:rs. 39.I:i TIMBlll. 396 397 MEDICINE. Shoots. 398 Bark. Tl~ggR. 400 DOMESTIC. 40I IIO Dictionary of the Economio DICLIPTERA Roxburghiana. Dichrostachys. GUM. 403 DYE. 4.04 FIBRE. 40; MEDICINE. Shoots. 406 FODDER. 407 TIMBER. 408 409 410 Royte,lll,Him,Bot" 182/ Lioiard, D,JI8S,33/ Waiso1>'s Report, '8; Balfo.tr, CyMop., 946 i. Ra,i. Gaz., 29 j Indian Forester, Vols. Ill., 202; lV., 232; VIII.,30j .Il.1.,466; XII., 33; App., 2; Gaiifettellr, N.-W. P. (Bundllikhand), Vol. I" 80; (Agra), Vol. IV'., LXXI. Habitat.-A thorny shrub or small tree of the dry, stony hills of the N.-W. Provinces, Western and Central India, Rajputana, Madras, Ceylon, &c. Distributed to the Malay Islands, Northern Australia. Doubtfully distinct from D. nutans, a native of Tropical Africa. Gurn.-It is said to yield a gum, but of this nothing is known. Dye.-The lac insect is often found on the tree. Fibre.-Mr. J. W. Cherry of Salem, Madras, sent to the Calcutta International Ex.hibition a sample of a yellowish white good bast fibre which was said to have been obtained from this plant. Medicine.-The young SHOOTS are bruised and applied to

CENSUS OF INDIA, 1931

कोली राजपूत सविधान में

Koli Rajput in Constitutions 


CENSUS OF INDIA, 1931.

VOLU'ME XXVII . ~ \ .

RAJPUTANA AGENCY

Kolia divide themaelve into two classes (I) Gaikriya Koli, (2) Dom Koli. Tha Gaikriya Koll claims to he a non-Dom and as such, claims for bimself a place somewhere between Khassiya and dom. He feels offended if he is called a dom either by a Rajput or a Dom and will even file a defamatory suit against him. Up till now only one case seems to have gone as far as  the Hazur court, the final court of justice in Tehri garhwal state, in which the punisgment of fine on the accused was upheld on the ground that the word dom was, under the circumstances of the case, definitely used with intent to insult and to provoke the complainant koli. But a decree purportmg to declare the status of the Koli as a non-Dom, has not been given so far by any court. The Gaikriya Koli observes many Hindu cerimonies - such as untouchability of a woman for 11 daya after child-birth, garhapuja or propitisting the star, and the keeping of horoscope. Some Koli have even porformed sraddha ceremony and some have married their daughter acording to the Brahman form of marriage. which is the highest form of marrige among हिन्दुस्उनके पास उनके ब्राह्मण पुरोहित हैंजो बच्चे के जन्म के 11 दिन बाद गर्भ पूजा के बाद महिला के शुद्धिकरण के रूप में साक्षात्कार करते हैं, कुंडली की तुलना करते हैंकुंडली बनाते हैंऔर श्राद्ध समारोह करते हैं।


Census Of Iildia, 1931 VoL~• I-INDIA पार्ट 111-Ethnogr~phical संविधान के अनुच्छेद 341  सुप्रीम कोर्ट के विभन्न फैसलों के जरिए यह स्थापित किया जा चुका है कि किसी भी जाति अथवा उपजाति को एससी में शामिल कि जाने की कार्यवाही राज्य सरका से विमर्श के बाद केन्द्र सरका ही कर सकती है और संसद ही इस विषय में कानून बना सकती है। आजतक उत्तराखंड के कोलियो को सविधान में अनुसूचित जाति में नहीं रखा है।⁠⁠⁠⁠

News कोली को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं: हाईकोर्ट

कोली को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं: हाईकोर्ट



कोली को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं: हाईकोर्ट


dainikbhaskar.com | May 14,2015 10:20 PM IST


इलाहाबाद. कोली और कोरी को एक ही जातियां होने के मामले में गुरुवार को हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि कोली को कोरी जाति की तरह अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं है। न्यायालय ने कहा कि किसी भी जाति को एससी/एसटी अथवा ओबीसी जाति में शामिल करने सहित इन जातियों को किसी जाति विशेष से अलग करने का अधिकार कोर्ट को प्राप्त नहीं है।



निर्णय में कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्‍ट्रपति को किसी जाति को किसी जाति में शामिल करने अथवा किसी जाति से अलग करने का अधिकार है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचुड़ और न्यायमूर्ति एमके गुप्ता की खंडपीठ ने महस्ती अनुसूइया कोरी ग्रामीण जन कल्याण समिति की जनहित याचिका पर दिया है। याचिका में मांग की गई थी यूपी के कई जिलों में कोली जाति के लोग निवास करते हैं।


याचिका में कहा गया है कि कोली और कोरी एक ही जातियां है। वहीं, कोरी को यूपी में एससी का दर्जा प्राप्त है और उन्हें एससी सर्टिफिकेट भी दिया जा रहा है। वहीं, इसी जाति के कोली को राज्‍य में एससी का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाना गलत है।




जनहित याचिका में कहा गया था कि कोरी और कोली दोनों एक ही जाति है। ऐसे में दोनों को एससी का यूपी में सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए। यह भी कहा गया था कि यूपी सरकार कोली को एससी का सर्टिफिकेट नहीं दे रही है। ऐसा करने का अधिकार केवल संविधान के अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्‍ट्रपति को ही है।

News शिल्पकार उपजातियों की अधिसूचना रद्द करने की तैयारी


News भूल सुधारेगी सरकार, शिल्पकार उपजातियों की अधिसूचना रद्द करने की तैयारी




भूल सुधारेगी सरकार, शिल्पकार उपजातियों की अधिसूचना रद्द करने की तैयारी

राकेश खंडूड़ी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 27 Sep 2017 09:56 AM IST

सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत

सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत - फोटो : SELF

प्रदेश सरकार शिल्पकार जाति में शामिल की गईं 47 उपजातियों को लेकर जारी अधिसूचनाओं को निरस्त कर सकती है। पूर्व सरकार में ये अधिसूचनाएं जारी हुई थीं। मगर अधिसूचनाओं को लेकर हुई शिकायतों के बाबत न्याय विभाग ने सरकार को जो परामर्श दिया है, उससे खलबली मची है।

न्याय विभाग के परामर्श के मुताबिक, प्रदेश सरकार को अनुसूचित जाति की सूची में उपजातियों को शामिल करने का संवैधानिक अधिकार नहीं था। न्याय विभाग ने अधिसूचनाओं को निरस्त करने का परामर्श दिया है। विभाग असमंजस में है और प्रकरण की फाइल अपर मुख्य सचिव, समाज कल्याण डॉ. रणवीर सिंह के पास पहुंची है। उनके मुताबिक, पूरे प्रकरण के अध्ययन के उपरांत ही निर्णय लिया जाएगा।


कायदे से अनुसूचित जाति का दर्जा देने का अधिकार केंद्र सरकार को है। इसके लिए देश की संसद में बाकायदा प्रस्ताव पारित होता है। राज्य सरकार को इसका एक प्रस्ताव केंद्र को भेजना था। मगर वर्ष 2013 में पूर्व सरकार में तत्कालीन प्रमुख सचिव, समाज कल्याण एस. राजू ने 16 दिसंबर 2013 को पहली अधिसूचना जारी की, जिसमें 38 उपजातियों को शिल्पकार जाति में शामिल किया गया। उसके बाद 30 जनवरी 2014 को नौ उपजातियों को सूची में शामिल करने की दूसरी अधिसूचना जारी की। मजेदार बात यह है कि इनमें से कई जातियां अनुसूचित जाति की श्रेणी में पहले से शामिल थीं। ऐसे में कतिपय उपजातियों को लेकर अधिसूचनाएं जारी करने के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं।

क्या है गोलमाल, जानिए...

uttarakhand govt

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- उत्तराखंड में शिल्पकार नाम की अलग से कोई जाति न होकर शिल्पकार एक समूह है।

- लोहार ,सोनार, दर्जी, गद्दी केवट, धुनार, ताम्रकार, मिस्त्री को शिल्पकार की सूची में शामिल होने चाहिए।

- शिल्पकार जाति के इन लोगों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त करने में प्रशासनिक कठिनाई से बचाना है।


शिल्पकार की सूची में दर्ज उपजातियां

आगरी या अगरी, औजी या बाजगी या ढोली, दास, दर्जी, अटपहरिया, बादी या बेड़ा बेरी या बैरी, बखरिया, बढ़ई, बोरा, भाट, भूल, तेली, चनेला या चन्याल, चुनेरा, चुनियारा, डालिया, धलोटी, धनिक, धोनी, धुनिया, ढौड़ी या ढोंडिया, कोल्टा, होबियारा, हुड़किया, मिरासी, जागरी या जगरिया, जमारिया, कोली, कुम्हार, लोहार, ल्वार, राज, ओड, मिस्त्री, नाई, नाथ या जोगी, पहरी या प्रहरी, पातर, रौन्सल, रुडिया या रिंगालिया, सिरडालिया, सुनार या सोनार, टम्टा, तमोटा, ताम्रकार, तिरुवा, तूरी, आर्य-शिल्पकार, पार्की, सांगडी, धुनार, केवल, डोम, मौर, पोरी, पम्मी व दमाई।


एससी हैं, मगर प्रक्रिया गलत

केंद्र सरकार की अनुसूचित जाति की सूची में 65 जातियों का उल्लेख है। 64वें स्थान पर शिल्पकार जाति है। लेकिन उत्तराखंड में शिल्पकार नाम की अलग से कोई जाति नहीं है। शिल्पकार जातियों का एक समूह है, जिसमें विभिन्न जातियां आती हैं। सूत्रों की मानें तो राज्य सरकार गलती सुधारने के लिए अधिसूचना निरस्त कर सकती है और फिर उपजातियों को एससी शिल्पकार की श्रेणी में शामिल करने के लिए प्रस्ताव को केंद्र सरकार को भेज सकती है।


मामले में समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव डा. रणवीर सिंह का कहना है कि प्रकरण मेरे संज्ञान में हैं। न्याय विभाग ने अधिसूचना निरस्त करने का परामर्श दिया है। मगर में पूरे प्रकरण का अध्ययन करने के बाद ही निर्णय लूंगा। यह प्रश्न भी है कि जिन जातियों के लोगों को प्रमाण पत्र जारी हो रहा था, उन्हें किन कारणों से उपजातियों की सूची में शामिल करने की आवश्यकता पड़ी?

News 52 जातियों को शिल्पकार घोषित करने पर सरकार का जवाब तलब

52 जातियों को शिल्पकार घोषित करने पर सरकार का जवाब तलब

Haldwani Bureau Updated Sun, 08 Oct 2017 02:31 AM IST

नैनीताल। उच्च न्यायालय ने 52 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने से संबंधित मामले में प्रदेश सरकार का जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।

16 दिसंबर 2013 को प्रदेश में 52 जातियों को अनुसूचित जाति (शिल्पकार) में शामिल करने के लिए अधिसूचित किया गया था। गढ़वाल राजपूत सभा ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इस अधिसूचना को चुनौती दी थी। याची का कहना था कि अनुसूचित घोषित की गई कुछ जातियां अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य जातियों में शामिल थीं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप और संविधान के अनुच्छेद 341 व 342 के अनुसार अनुसूचित जाति घोषित करने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है। यह अधिकार सिर्फ भारत की संसद को है। भारत के राष्ट्रपति की ओर से ही इस तरह की अधिसूचना जारी की जा सकती है। याची के मुताबिक सूचना के अधिकार में मांगी गई सूचना में प्रदेश सरकार ने स्वयं 23 जुलाई 2015 को यह कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा देने का अधिकार राज्य सरकार को नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अधिसूचना जारी होने के बाद बहुत लोगों को नौकरी व अन्य लाभ प्राप्त हुए होंगे। खंडपीठ ने इस संबंध में प्रदेश सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिये।


https://www.amarujala.com/uttarakhand/nainital/1507410137552-nainital-news

News न्याय विभाग ने उत्तराखंड में 47 उपजातियों को SC के दर्जे में रखने पर आपत्ति जताई

न्याय विभाग ने उत्तराखंड में 47 उपजातियों को SC  के दर्जे में रखने पर आपत्ति जताई

अंग्वाल न्यूज डेस्क


न्याय विभाग ने उत्तराखंड में 47 उपजातियों को SC  के दर्जे में रखने पर आपत्ति जताई


देहरादून । उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के सामने एक दुविधा आ गई है। असल में सरकार के सामने एससी वर्ग की शिल्पकार उपजातियों को लेकर पशोपेश की स्थिति में है। सरकार के न्याय विभाग ने एससी वर्ग की 47 उपजातियों को SC  के दर्जे में रखे जाने को लेकर आपत्ति जताई है। विभाग इन उपजातियों को SC दर्जे में रखे जाने को उचित नहीं मानता है। ऐसे में विभाग ने सरकार को इन जातियों को लेकर जारी अधिसूचना निरस्त करने की सलाह दी है, लेकन सरकार को शंका है कि ऐसा करने की सूरत में विवाद खड़ा हो सकता है। 

असल में समाज कल्याण विभाग के सामने ये उलझन है कि वह ऐसी स्थिति में क्या करे। न्याय विभाग ने इन उपजातियों को SC दर्जे में रखे जाने को गलत ठहराया है, लेकिन इन उपजातियों की अधिसूचना निरस्त की जाती है तो राज्य में एक नया विवाद खड़ा होने की आशंका है। अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण डॉ. रणवीस सिंह का इस मुद्दे पर कहना है कि न्याय विभाग ने जो सुझाव दिया है अभी उस पर अध्ययन किया जा रहा है। देखा जा रहा है कि आखिर किन बिन्दुओं पर ध्यान दिया गया है और किन पर नहीं। जल्द ही इस मुद्दे पर फैसला लिया जाएगा। 


बता दें कि कांग्रेस की हरीश रावत सरकार ने SC की 40 से ज्यादा उपजातियों को शिल्पकार की उपजाति मानते हुए अधिसूचना जारी कर दी थी। हालांकि इसका एक वर्ग ने विरोध किया था। अब सरकार इस मुद्दे को लेकर दोराहे पर खड़ी नजर आ रही है। अगर वह न्यान विभाग की राय को अनदेखा करती है तो सवाल उठेंगे और अगर राय पर विचार करते हुए अधिसूचना निरस्त कर देती है तो हंगामा होना तय है। 



http://www.angwaal.com/uttrakhandnews/objection-to-47-sub-castes-status-of-sc-in-uttarakhand-21692


न्याय विभाग ने उत्तराखंड में 47 उपजातियों को SC  के दर्जे में रखने पर आपत्ति जताई

अंग्वाल न्यूज डेस्क


न्याय विभाग ने उत्तराखंड में 47 उपजातियों को SC  के दर्जे में रखने पर आपत्ति जताई

देहरादून । उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के सामने एक दुविधा आ गई है। असल में सरकार के सामने एससी वर्ग की शिल्पकार उपजातियों को लेकर पशोपेश की स्थिति में है। सरकार के न्याय विभाग ने एससी वर्ग की 47 उपजातियों को SC  के दर्जे में रखे जाने को लेकर आपत्ति जताई है। विभाग इन उपजातियों को SC दर्जे में रखे जाने को उचित नहीं मानता है। ऐसे में विभाग ने सरकार को इन जातियों को लेकर जारी अधिसूचना निरस्त करने की सलाह दी है, लेकन सरकार को शंका है कि ऐसा करने की सूरत में विवाद खड़ा हो सकता है। 

असल में समाज कल्याण विभाग के सामने ये उलझन है कि वह ऐसी स्थिति में क्या करे। न्याय विभाग ने इन उपजातियों को SC दर्जे में रखे जाने को गलत ठहराया है, लेकिन इन उपजातियों की अधिसूचना निरस्त की जाती है तो राज्य में एक नया विवाद खड़ा होने की आशंका है। अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण डॉ. रणवीस सिंह का इस मुद्दे पर कहना है कि न्याय विभाग ने जो सुझाव दिया है अभी उस पर अध्ययन किया जा रहा है। देखा जा रहा है कि आखिर किन बिन्दुओं पर ध्यान दिया गया है और किन पर नहीं। जल्द ही इस मुद्दे पर फैसला लिया जाएगा।